“6 महीने की जेल या 1 लाख का जुर्माना”, बोरवेल खोदने से पहले ये खबर जरूर पढ़ें

जयपुर: राजस्थान विधानसभा ने पानी के लगातार गिरते स्तर और बढ़ते जल संकट को देखते हुए एक ऐतिहासिक कानून पारित किया है। बुधवार को विधानसभा ने भूजल (संरक्षण एवं प्रबंधन) प्राधिकरण विधेयक 2025 पास कर दिया। इस नए कानून के बाद अब राज्य में बोरवेल या ट्यूबवेल खोदना आसान नहीं रहेगा। किसी भी व्यक्ति या संस्था को भूजल दोहन से पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी।

कानून का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना और जेल की सजा तय की गई है। पहली बार नियम तोड़ने पर 50 हजार रुपये तक का जुर्माना और बार-बार उल्लंघन करने पर 6 महीने तक की जेल और/या 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।

क्यों ज़रूरी था यह नया कानून?

राजस्थान देश का सबसे शुष्क राज्य है। यहाँ औसत वर्षा बेहद कम होती है और बड़ी आबादी अपनी ज़रूरतों के लिए भूजल (Groundwater) पर निर्भर है।

  • राज्य के कुल 302 ब्लॉकों में से 219 ब्लॉक पहले ही ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ घोषित हो चुके हैं।
  • यानी यहाँ से जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना वापस ज़मीन में नहीं जा रहा।
  • खेती, उद्योग और घरेलू इस्तेमाल में लगातार बढ़ते दबाव के कारण पानी का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।
  • कई ज़िलों में पानी का स्तर हर साल औसतन 10 मीटर गिर रहा है।
  • 2022 के सर्वे के अनुसार राज्य के अलग-अलग हिस्सों में भूजल स्तर 0.15 मीटर से लेकर 190.40 मीटर तक नीचे दर्ज किया गया।

बारां, भीलवाड़ा, नागौर, झुंझुनूं और बाड़मेर जैसे ज़िलों में गर्मियों में लोग कई-कई किलोमीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं। किसानों के कुएं और ट्यूबवेल हर सीजन सूख जाते हैं। यही कारण है कि सरकार ने अब सख़्त क़दम उठाया है।

नया कानून क्या कहता है?

  1. अनुमति अनिवार्य
    • अब कोई भी व्यक्ति, किसान, व्यापारी या उद्योगपति नया ट्यूबवेल/बोरवेल खोदने से पहले प्राधिकरण से लाइसेंस लेगा।
    • बिना अनुमति खुदाई करने पर सीधा जुर्माना लगेगा।
  2. जुर्माना और सज़ा
    • पहली बार उल्लंघन पर: ₹50,000 तक का जुर्माना।
    • दोबारा उल्लंघन पर: 6 महीने तक जेल और/या ₹1 लाख का जुर्माना।
  3. मीटर और टैरिफ
    • औद्योगिक और वाणिज्यिक ट्यूबवेल पर मीटर लगाना अनिवार्य होगा।
    • जितना पानी निकलेगा, उतना टैरिफ देना पड़ेगा।
    • फिलहाल खेती और घरेलू उपयोग वाले ट्यूबवेल पर यह नियम लागू नहीं है।
  4. डार्क ज़ोन इलाकों में सख़्ती
    • जिन ब्लॉकों को “डार्क ज़ोन” घोषित किया गया है, वहाँ नई खुदाई लगभग नामुमकिन होगी।
    • अनुमति प्रक्रिया बेहद सख़्त होगी और ज़्यादातर मामलों में रोक लगाई जाएगी।
  5. भूजल प्राधिकरण की स्थापना
    • राज्य स्तर पर “भूजल संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण” बनाया जाएगा।
    • यही संस्था लाइसेंस, रिग पंजीकरण, निगरानी और रिपोर्टिंग का काम करेगी।
    • हर साल विधानसभा में रिपोर्ट पेश करनी होगी।
  6. जिला स्तर पर समितियाँ
    • हर ज़िले में भूजल संरक्षण और प्रबंधन समिति बनेगी।
    • ये समितियाँ स्थानीय योजनाएँ तैयार करेंगी और उन्हें लागू करवाएँगी।
  7. विशेषज्ञों और विधायकों की भागीदारी
    • प्राधिकरण में जल संरक्षण और इंजीनियरिंग से जुड़े कम-से-कम 20 साल का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ होंगे।
    • साथ ही दो विधायक भी सदस्य बनाए जाएंगे।
  8. छूट की व्यवस्था
    • सरकार कुछ क्षेत्रों या सेक्टरों (जैसे छोटे किसान, पीने का पानी, या आपातकालीन स्थिति) को अनुमति और शुल्क में छूट दे सकती है।

किसानों पर असर

  • नया ट्यूबवेल खोदने पर अनुमति ज़रूरी होगी।
  • डार्क ज़ोन वाले इलाकों में किसानों को नई खुदाई की अनुमति मिलने की संभावना बहुत कम है।
  • पुराने ट्यूबवेल और कुएँ पर फिलहाल कोई सीधा असर नहीं, लेकिन उनकी निगरानी होगी।
  • भविष्य में पानी का टैरिफ खेती पर भी लागू हो सकता है, हालांकि अभी यह नियम केवल उद्योगों तक सीमित है।
  • जिन इलाकों में हर साल पानी सूख जाता है, वहाँ अब किसान को सरकारी योजनाओं और समितियों के ज़रिए जल संरक्षण के कामों में भाग लेना होगा।

किसानों पर सीधा असर

खेती के लिए नया बोरवेल

  • अब किसान भी नया ट्यूबवेल खोदने से पहले अनुमति लेंगे।
  • डार्क ज़ोन इलाकों में यह अनुमति लगभग असंभव होगी।

पुराने ट्यूबवेल

  • फिलहाल पुराने ट्यूबवेल पर रोक नहीं है, लेकिन उनकी निगरानी होगी।
  • पानी का अत्यधिक दोहन मिलने पर आगे और नियम लागू हो सकते हैं।

अनुमति प्रक्रिया और दस्तावेज़

  • किसान को आवेदन करना होगा (ऑनलाइन/जिला समिति स्तर पर)।
  • ज़मीन के दस्तावेज़, उपयोग का उद्देश्य और तकनीकी जानकारी देनी होगी।
  • समिति जलस्तर का आकलन करके अनुमति देगी या रोकेगी।

रिग पंजीकरण और ठेकेदारों पर असर

  • अब हर बोरवेल रिग (मशीन) का पंजीकरण अनिवार्य होगा।
  • बिना पंजीकृत मशीन से खुदाई करना अपराध माना जाएगा।
  • किसानों को ध्यान रखना होगा कि वे केवल पंजीकृत ठेकेदारों से ही खुदाई करवाएँ।

जनता को क्या करना चाहिए?

  1. अनुमति लिए बिना खुदाई न करें।
  2. केवल पंजीकृत ठेकेदार से ही बोरवेल खुदवाएँ।
  3. अगर आपके क्षेत्र को डार्क ज़ोन घोषित किया गया है, तो नई खुदाई की कोशिश न करें।
  4. पानी बचाने के लिए खेत तालाब, डिग्गी, वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों को अपनाएँ।
  5. पंचायत/जिला समिति से जुड़ी जानकारी समय-समय पर लेते रहें।

फायदे और चुनौतियाँ

फायदे

  • अनियंत्रित पानी का दोहन रुकेगा।
  • आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी बचाया जा सकेगा।
  • जल संरक्षण योजनाओं को बढ़ावा मिलेगा।

चुनौतियाँ

  • अनुमति प्रक्रिया किसान और ग्रामीणों के लिए जटिल हो सकती है।
  • भ्रष्टाचार और दलाली का खतरा।
  • गरीब किसान के लिए शुल्क/अनुमति का खर्च बोझ बन सकता है।

दूसरे राज्यों का अनुभव

  • महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी भूजल नियंत्रण कानून लागू हैं।
  • शुरू में वहाँ भी विरोध हुआ, लेकिन धीरे-धीरे जनता ने नियमों को स्वीकार किया।
  • राजस्थान को इन राज्यों से सीख लेकर प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनानी होगी।

बड़ा संदेश

संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने विधानसभा में कहा कि इस बिल से “अनियंत्रित भूजल दोहन पर अंकुश लगेगा और डार्क ज़ोन इलाकों में स्थिति पर निगरानी आसान होगी।”

वास्तव में यह कानून केवल पाबंदी लगाने के लिए नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी बचाने की कोशिश है। अगर आज नियंत्रण नहीं लगाया गया तो भविष्य में हालात और भी भयावह हो सकते हैं।

निष्कर्ष

राजस्थान का जल संकट केवल सरकार की चिंता नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। यह नया कानून हमें चेतावनी देता है कि पानी का दुरुपयोग अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

साफ संदेश है – बोरवेल खोदने से पहले अनुमति लो, वरना भारी जुर्माना और जेल दोनों का सामना करना पड़ सकता है।

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